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Saturday, 16 May 2020

May 16, 2020

तवांग खूबसूरती के लिए जाना जाता है

तवांग खूबसूरती के लिए जाना जाता है




तवांग खूबसूरती के लिए जाना जाता है
फोटो :Pinterest -Google 




अरुणाचल प्रदेश मे स्थित है तवांग। यह शहर अरुणाचल प्रदेश के सबसे पश्चिम में स्थित तवांग जिला अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता है। समुद्र तल से करीब 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस जिले की सीमा उत्तर में तिब्बत, दक्षिण-पूर्व में भूटान और पूर्व में पश्चिम कमेंग के सेला पर्वत श्रृंखला से लगती है।  ऐसा माना जाता है कि तवांग शब्द की व्युत्पत्ति तवांग टाउनशिप के पश्चिमी भाग के साथ-साथ स्थित पर्वत श्रेणी पर बने तवांग मठ से हुई है। ‘ता’ का अर्थ होता है- ‘घोड़ा’ और ‘वांग’ का अर्थ होता है- ‘चुना हुआ।’



पौराणिक कथाओं के अनुसार इस स्थान का चुनाव मेराग लामा लोड्रे ग्यामत्सो के घोड़े ने किया था। मेराग लामा लोड्रे ग्यामत्सो एक मठ बनाने के लिए किसी उपयुक्त स्थान की तलाश कर रहे थे। उन्हें ऐसी कोई जगह नहीं मिली, जिससे उन्होंने दिव्य शक्ति से मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करने का निर्णय लिया। प्रार्थना के बाद जब उन्होंने आंखे खोली तो पाया कि उनका घोड़ा वहां पर नहीं है।

वह तत्काल अपना घोड़ा ढूंढने लगे। काफी परेशान होने के बाद उन्होंने अपने घोड़े को एक पहाड़ की चोटी पर पाया। अंतत: इसी चोटी पर मठ का निर्माण किया गया और तवांग शब्द की व्युत्पत्ति हुई। प्राकृतिक सुंदरता के मामले में तवांग बेहद समृद्ध है और इसकी खूबसूरती किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देती है।

यहां सूरज की पहली किरण सबसे पहले बर्फ से ढंकी चोटियों पर पड़ती है और यह नजारा देखने लायक होता है। वहीं सूरज की आखिरी किरण जब यहां से गुजरती है तो पूरा आसमान अनगिनत तारों से भर जाता है।



यहा के पर्यटन स्थल
तवांग में देखने के लिए मठ, पहाड़ों की चोटी और झरने सहित कई चीजें हैं, जहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। तवांग के कुछ प्रमुख आकर्षण में तवांग मठ, सेला पास और ढेर सारे जलप्रपात हैं, जिससे यह बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग के लिए भी पसंदीदा स्थान बन जाता है।
यहां कई झील, नदी और ऊंचे-ऊंचे जलप्रपात हैं। जब इनके पानी में नीले आकाश और बादलों का प्रतिबिंब उभरता है तो पर्यटकों के लिए यह नजारा कभी न भूलने वाला नजारा साबित होता है। अगर आप सही मायानों में प्रकृति प्रेमी हैं, तो यह छुपा हुआ स्वर्ण बाहें फैला कर आपका स्वागत कर रहा है।

यहा के मेला और त्योहार की जानकारी 
मेला और त्योहार अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय लोगों का एक अहम हिस्सा है। तवांग के मोनपा जनजाति के साथ भी ऐसा ही है। अरुणाचल प्रदेश की दूसरी जनजातियों की तरह ही मोनपा समुदाय के त्योहार भी मुख्य रूप से कृषि और धर्म से जुड़े होते हैं।  तवांग के मोनपा हर साल कई त्योहार मनाते हैं। इन्हीं में से एक है लोसर। यह नए साल का त्योहार है, जो पूरे हर्षोल्लास के साथ फरवरी अंत और मार्च की शुरुआत में मनाया जाता है।

दूसरे त्योहारों में तोरग्या भी अहम है। इसे हर साल लुनार कैलेंडर के अनुसार 11वें महीने की 28वीं तारीख को मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह आमतौर पर जनवरी में पड़ता है। ऐसा माना जाता है कि यह त्योहार उन दुष्ट आत्माओं को खदेड़ने के लिए मनाया जाता है, जो मनुष्य के साथ-साथ फसलों में भी बीमारियां पैदा करती है और दुर्भाग्य लाती है। साथ ही यह बुरी आत्माएं कई तरह के प्राकृतिक आपदाओं के लिए भी जिम्मेदार होती है। साका दावा त्योहार भी लुनार कैलेंडर के अनुसार 11वें महीने की 28 तारीख को मनाया जाता है, जो कि आमतौर पर जनवरी में पड़ता है।

चोएकोर एक धार्मिक जुलूस है, जिसका आयोजन पूरे गांव द्वारा किया जाता है। इसका उद्देश्य फसलों को आलौकिक शक्तियों से बचाना और अच्छी पैदावार करना है। साथ ही इस जुलूस का मकसद गांव को नुकसान पहुंचाने वाली दुष्ट आत्माओं को भगाना भी होता है। चोएकोर को लुनार कैलेंडर के अनुसार सातवें महीने में मनाया जाता है, जब कृषि की गतिविधियां काफी कम होती है।

यहा के कला और शिल्प

तवांग के मोनपा लोग शिल्पकारिता में भी काफी दक्ष होते हैं। यहां के बाजारों में खूबसूरत परंपरागत शिल्प को देखकर इस बात अंदाजा भी हो जाता है। ये शिल्प सरकारी शिल्प केन्द्र में भी उपलब्ध रहते हैं। लकड़ी से बने सामान, बुने हुए कार्पेट और बांस से बने बर्तन की खूबसूरती देखने लायक होती है।

यहां के लोगों ने थनका पेंटिंग और हाथ से बने पेपर के जरिए भी काफी नाम कमाया है। लकड़ी से बने शिल्पकृति में लकड़ी का मुखौटा भी प्रझमुख है। इसका इस्तेमाल तोरग्या त्योहार के दौरान तवांग मठ के प्रांगण में होने वाले नृत्य के दौरान किया जाता है।

दोलोम एक कलात्मक रूप से डिजाइन किया गया खाने का बर्तन है, जिसका ढक्कन लकड़ी का बना होता है। शेंग ख्लेम एक लकड़ी का बना चम्मच है। वहीं ग्रुक लकड़ी का बना एक कप है, जिसका इस्तेमाल चाय पीने के लिए किया जाता है।

यहा घूमने के लिए सबसे अच्छा समय

साल के ज्यादातर समय तवांग को मौसम सामान्य ही बना रहता है। मार्च से अक्टूबर के बीच तवांग घूमना सबसे अच्छा माना जाता है। इस दौरान यहां का मौसम काफी खुशगवार होता है।

तवांग कैसे पहुंचे

देश के अन्य हिस्सों से तवांग गुवाहाटी और तेजपुर होते हुए पहुंचा जा सकता है। दिल्ली से गुवाहाटी के लिए इंडियन एयरलाइन, जेट एयरवेज और सहारा एयरलाइन की हर दिन फ्लाइट रहती है। इसके अलावा कोलकाता और दूसरे जगहों से भी गुवाहाटी के लिए उड़ानें मिलती हैं। वहीं राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन भी गुवाहाटी जाती है।

Thursday, 14 May 2020

May 14, 2020
कोहिमा शहर पर्यटको के स्थल जाने


कोहिमा शहर पर्यटको के स्थल जाने
कोहिमा फोटो :Flickr -Google








कोहिमा नगालैंड की राजधानी है। पूर्वोत्‍तर भारत के सबसे सुंदर स्‍थानों में से एक है कोहिमा । इस जगह ने पीढि़यों से लोगों को अपनी सुंदरता से मंत्रमुग्‍ध कर रखा है। कोहिमा को यह नाम अंग्रेजों के द्वारा दिया गया था, क्‍योकि वह लोग कोहिमा का वास्‍तविक नाम केवहिमा या केवहिरा सही ढंग से उच्‍चारण नहीं कर पाते थे।
कोहिमा का नाम केवहिमा यहां पाएं जाने वाले केवही फूलों के कारण रखा गया है जो इस शहर में चारों ओर पहाड़ों में पाए जाते हैं। बहुत पहले कोहिमा में अंगामी जनजाति ( नागा जनजाति में सबसे बड़ी ) निवास किया करती थी, वर्तमान में यहां नगालैंड के विभिन्‍न हिस्‍सों और अन्‍य पड़ोसी राज्‍यों से भी कई जाति के लोग रहने आते हैं।


कोहिमा नगालैंड की राजधानी
अगर आप कोहिमा के इतिहास के बारे में जानेगें, तो पाएंगे कि यह क्षेत्र, दुनिया से अन्‍य भागों से हमेशा बिल्‍कुल अलग रहा है, इस जगह के अधिकाश: भागों में हमेशा नागा जनजाति ने निवास किया है। इस जगह पर 1840 में ब्रिटिश आए थे, जिन्‍होने नागा जनजाति के कड़े प्रतिरोध का सामना किया था।
चार दशकों के लम्‍बे विरोध और झड़प के बाद, ब्रिटिश प्रशासकों ने इस क्षेत्र  पर आधिपत्‍य स्‍थापित कर लिया था और कोहिमा को नागा पहाड़ी जिले का प्रशासनिक मुख्‍यालय बना लिया, जो उस समय असम का हिस्‍सा हुआ करता था। 1 दिम्‍बर 1963 को, कोहिमा को नागालैंड राज्‍य की राजधानी बना दिया गया। नागालैंड, भारत के संघ में 16 वां राज्‍य था।
कोहिमा, कई कट्टर लड़ाईयों की गवाह है, द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान आधुनिक जापानी सेना और अन्‍य मित्र देशों के बीच होने वाले कोहिमा का युद्ध और टेनिस कोर्ट की लड़ाई, कोहिमा ने  देखी है। यहां यह है कि वर्मा अभियान ने जापानी साम्राज्‍य के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी और दक्षिण पूर्व एशिया में युद्ध का पूरा अर्थ ही बदल दिया।
साथ ही यह भी कहा जा सकता है  कि मित्र देशों की सेना, जापान की उन्‍नति को रोकने में सक्षम थे। कोहिमा युद्ध स्‍थल को राष्‍ट्रमंडल युद्ध समाधि प्रस्‍तर आयोग के द्वारा बनाया गया था, जो यहां आने वाले सभी पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र है, जहां सौ से भी ज्‍यादा शहीद हुए सैनिकों की कब्र बनी है।

पर्यटकों के स्थल
यह शहर पर्यटकों को झोली भर - भर कर प्राकृतिक सुंदरता के नैसर्गिक दृश्‍यों का उपहार देती है। यहां आकर आंगतुक, प्रकृति के बेहद लुभावने नजारों को देखते हैं। ऊंची चोटियां, घुमड़ते बादल  और बहकती हवा, पर्यटकों के लिए इस जगह को खास बना देती है।
दुनिया के विभिन्‍न हिस्‍सों से पर्यटक यहां आकर कोहिमा चिडि़याघर, राज्‍य संग्रहालय, जुफु चोटी की सैर अवश्‍य करते हैं। अगर आप कभी कोहिमा की सैर के लिए जाएं तो दझुकोउ घाटी और दझुलेकि झरना जरूर देखें। कोहिमा में स्थित कोहिमा कैथोलिक चर्च, पूरे देश में स्थित गिरिजाघरों में से सबसे बड़ा और सबसे सुंदर चर्च है। यह एक बेहतरीन पर्यटक स्‍थल भी है, इसे अवश्‍य देखना चाहिए।

यहा के संस्‍कृति 
नागालैंड के लोगों को और मुख्‍य रूप से कोहिमा के लोगों को उनके प्‍यार और आतिथ्‍य के लिए जाना जाता है और यहां आकर पर्यटकों को स्‍थानीय व्‍यंजनों को चखना नहीं भूलना चाहिए। यहां  की नागा जनजाति को मांस और फिश बहुत अच्‍छी लगती है और यह लोग इसे बेहद खास तरीके से पकाते है जो वाकई में लोगों के मुंह में पानी ला देती है।
नागालैंड को यहां की समृद्ध  और जीवंत संस्‍कृति के लिए जाना जाता है और पर्यटक, कोहिमा में इस संस्‍कृति की झलक स्‍पष्‍ट रूप से देख सकते हैं। नागालैंड में प्रत्‍येक और हर जनजाति के पास उसकी स्‍वंय की औपचारिक  पोशाक होती है जो भिन्‍न रंगों के भाले, मृत बकरियों के बालों, चिडि़यों के पंखों और हाथी के दांतों आदि से निर्मित होती है।


 इनर लाइन परमिट पर्यटकों के लिए 
यह ध्‍यान देने योग्‍य बात है कि कोहिमा, संरक्षित क्षेत्र अधिनियम के अंर्तगत आता है जहां घरेलू पर्यटकों को यात्रा करने के लिए आईएलपी ( इनर लाइन परमिट ) की आवश्‍यकता पड़ती है। इनर लाइन परमिट एक साधारण पर्यटन दस्‍तावेज है। विदेशी पर्यटकों को इनर लाइन परमिट की आवश्‍यकता नहीं पड़ती है, उन्‍हे कोहिमा के संरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने व भ्रमण करने के लिए खुद को जिले के विदेशी पंजीकरण अधिकारी ( एफआरओ ) के पास पंजीकृत कराना होता है, पंजीकरण कराने के 24 घंटे के अंदर ही विदेशी पर्यटक आराम से सैर कर सकते हैं। वैसे घरेलू पर्यटक, इनर लाइन परमिट को इन स्‍थानों से भी प्राप्‍त कर सकते हैं -
उप आवासीय आयुक्‍त, नागालैंड हाउस, नई दिल्‍ली उप आवासीय आयुक्‍त, नागालैंड हाउस, कोलकातागुवाहाटी और शिलांग में सहायक आवासीय आयुक्‍त दीमापुर, को‍हिमा और मोकोकचुंग के उप आयुक्‍त

Wednesday, 13 May 2020

May 13, 2020

आइज़ोल शहर और यहा के पर्यटन स्थल केजानकारी

आइज़ोल शहर और यहा के पर्यटन स्थल के जानकारी 





आइज़ोल शहर और यहा के पर्यटन स्थल केजानकारी
फोटो :Lifebreeys-Google






आइज़ोल शहर पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों में से एक मिज़ोरम की राजधानी है। आइज़ोल एक सुंदर शहर है जो खड़ी पर्वत श्रेणियों, पहाडि़यों और घाटियों के बीच फैला हुआ है। सदियों पुराना यह शहर समुद्रतल से 1132 मी. ऊपर है और उत्तर में दुर्तलैंग की राजसी चोटियों से घिरा हुआ है। कई सालों से यहाँ बहने वाली तलौंग नदी आइज़ोल की सुंदरता को बढ़ाती है। आइज़ोल एक तेज़ी से बढ़ता हुआ शहर है जिसमें अनेक बहुमंजि़ली इमारतें हैं। चूंकि यह मिज़ोरम का सबसे तेज़ी से बढ़ता हुआ शहर है, इसका संरचनात्मक विस्तार आज की प्राथमिक आवश्यकता है।और यहा के पर्यटक स्थल काफि सुंदर है। और रोमांचक है। 

मिज़ो की भूमि
मिज़ोरम का शाब्दिक अर्थ है मिज़ो की भूमि जबकि मिज़ो का अर्थ है हाइलैंडर्स। देश के सबसे छोटे राज्यों में से एक, मिज़ोरम की अंतराष्ट्रीय सीमाएँ म्यांमार और बांग्लादेश से मिलती हैं जबकि इसकी अंतर-राज्य सीमाएँ असम, त्रिपुरा और मणिपुर से मिलती हैं। 1987 में राज्य घोषित किए जाने से पहले यह एक केंद्र शासित प्रदेश था। ऐसा माना जाता है कि मिज़ो मूल रूप से मंगोलियाई हैं और सदियों से इन पहाडि़यों में रह रहे हैं।

यहा  की परंपरा और संस्कृति
परंपरागत रूप से मिज़ो एक कृषि समाज में रहते हैं और इसलिए इनकी अधिकतर सांस्कृतिक प्रथाएँ कटाई और अन्य कृषि पद्धतियों के आसपास घूमती हैं। सदियों से मिज़ो झूम खेती कर रहे हैं जो कि स्लेश एंड बर्न कृषि का एक प्रकार है। मिम कुट और पौल कुट मिज़ो के दो मुख्य फसली त्योहार हैं जो क्रमशः अगस्त-सितंबर और दिसंबर-जनवरी के महीनों में मनाए जाते हैं। मिज़ो विशेषकर चेराव नृत्य(बांस के डंडों का उपयोग करते हुए लयबद्ध नृत्य) के लिए प्रसिद्ध हैं। एक सूक्ष्मदर्शी यात्री के लिए ये सांस्कृतिक पहलू आइज़ोल पर्यटन को रोचक बनाते हैं।

 पर्यटन स्थल के जानकारी 
दुर्ग रूपी शहर, आइज़ोल में कई पर्यटन स्थल हैं। चूंकि, आइज़ोल पर्यटन अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में हो सकता है, लेकिन फिर भी इसके आसपास के इलाकों में अनेक पर्यटन स्थल हैं जो रोमांचक और हैरान कर देने वाले हैं। शहर के पश्चिम में घाटी से नीचे की ओर बहने वाली हरी भरी तलौंग नदी देखे बिना आइज़ोल की यात्रा अधूरी है। तलौंग नदी शहर की पश्चिमी सीमा पर है और तुरियल नदी-घाटी पूर्व में ऐसा ही भव्य चित्र बनाती है।
तामदिल झील पर नाव की सवारी एक प्रमुख आकर्षण है जो कि शहर से बहुत दूर नहीं है। अगर आपको मछली पकड़ने का शौक है तो साइहा में छिमतुईपुई नदी एक बेहतरीन जगह है। 750 फीट की ऊँचाई से गिरने वाला मिज़ोरम का सबसे ऊँचा वनतवांग झरना देखे बिना आइज़ोल की यात्रा अधूरी रहती है। फौंगपुई मिज़ोरम की सबसे ऊँची चोटी है जो आर्किड, रोडोडेंड्रोन और पहाड़ी बकरियों व तितलियों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
आइज़ोल न केवल राज्य की राजधानी है बल्कि यह राज्य के सांस्कृतिक केंद्र के रूप में भी कार्य करता है। मिज़ोरम राज्य संगहालय, सोलोमन मंदिर तथा आइज़ोल की जुड़वा झील-रंगदिल झील आदि कुछ ऐसे पर्यटन स्थल हैं जो आइज़ोल पर्यटन को दिलचस्प बनाते हैं। आइज़ोल के पास एक लोकप्रिय स्थान है, रीक, जो राज्य की राजधानी के पास एक छोटा सा सांस्कृतिक गाँव है। इस गाँव में पर्यटकों को मिज़ो की विशिष्ट झोपडि़याँ देखने को मिलेंगी जबकि इस गाँव के किनारे प्राकृतिक जंगलों और पथरीली चट्टानों से सुसज्जित हैं।

 आइज़ोल कैसे पोचे 
नियमित उड़ानों से आइज़ोल कोलकाता और गुवाहाटी से जुड़ा है जो देश के बाकी हिस्सों से जुड़े हुए हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन सिलचार(शहर से लगभग 184कि.मी. दूर) में है जबकि राष्ट्रीय राजमार्ग 54 राज्य की राजधानी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है।

यहा के मौसम 
आरामदायक गर्मियों और सर्दियों के साथ आइज़ोल की जलवायु शीतोष्ण ओर सौम्य होती है। गर्मियों में औसत तापमान 20 से 29 डिग्री से. के बीच रहता है जबकि सर्दियों में यह 7 डिग्री से. तक पहुँच जाता है। आइज़ोल में हर साल वार्षिक वर्षा 254 से.मी. तक होती है।

Monday, 11 May 2020

May 11, 2020

जोवाई शहर के जानकारी

जोवाई शहर के जानकारी 


जोवाई शहर के जानकारी
फोट:Triapadvisor -Google 





जोवाई, मेघालय के बढ़ते औद्योगिक शहरों में से एक है। यह जैंतिया हिल्‍स जिले का जिला मुख्‍यालय है और यहां बहुतायत में पनार जनजाति निवास करती है। जोवई, माइंटडू नदी से तीन किनारों पर घिरा एक खूबसूरत शहर है और इसके चौथे सिरे पर बांग्‍लादेश की सीमा लगती है।और इस शहर मे पहाडी से भरे परे है। और खुबसुरत
नजारा दिखाई देता है।

एक पठार पर स्थित, जोवाई, समुद्र स्‍तर से 1380 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहां की जलवायु सुखद और शांत है। जयंतिया हिल्‍स, खनिजों से समृद्ध है और जोवाई के आसपास कई कोयला खानें भी स्थित है। इस प्रकार इस स्‍थल की अर्थव्‍यवस्‍था कोयला खानों से विकसित होती है।

जोवाई के आसपास के क्षेत्रों में स्थित पर्यटन स्‍थल

जोवाई में पर्यटक सबसे ज्‍यादा यहां मनाएं जाने वाले त्‍यौहार में शामिल होने आते है। इस खास त्‍यौहार को बेहदीमखालम उत्‍सव कहा जाता है जिसे प्रत्‍येक वर्ष जुलाई के दूसरे सप्‍ताह में आयोजित किया जाता है। बेहदीमखालम उत्‍सव, पनार आदिवासी जनजाति के द्वारा की जाने वाली कर्मकांडी अभिव्‍यक्ति है। इसके अलावा, यहां के अन्‍य आकर्षण मानव निर्मित थाडलासेकिन झील, लालांग पार्क और जोवाई प्रेस्बिटेरियन चर्च है जो जोवाई के पर्यटन को और आकर्षित बनाते है।

 कैसे पहुंचे जोताई 

जोवाई, मेघालय की राजधानी शिलांग से 65 किमी. की दूरी पर स्थित है। जोवाई तक पहुंचने के लिए पर्यटक, राज्‍य की राजधानी से एक पर्यटन वाहन या बोर्ड में बुकिंग करा सकते है जिनमें अंर्तगत वाहन थोड़े - थोड़े अंतराल के बाद चलते है। जो पर्यटक हवाई यात्रा करना चाहते है वह कोलकाता से उमरोई तक की उड़ान में सफर करें। हालांकि, यहां आने के लिए सबसे बेहतर विकल्‍प गुवाहटी एयरपोर्ट से होकर आना है।

जोवाई की सैर का सबसे अच्‍छा समय

जोवाई की सैर का सबसे अच्‍छा समय सर्दियों और गर्मियों के दौरान होता है। इस अवधि में पर्यटक बिना दिक्‍कत के सैर कर सकते है।